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टिप्पण लेखन हिंदी व्याकरण

टिप्पण लेखन हिंदी व्याकरण

टिप्पण लेखन

अंग्रेजी भाषा में ‘टिप्पण’ के लिए ‘Noting’ शब्द का प्रयोग होता है।‘टिप्पण’ का अर्थ है- टिप्पणी लिखने का कार्य।’ इस प्रकार ‘टिप्पण’ टिप्पणी लिखने की कला या प्रक्रिया का नाम है। जिस प्रकार संक्षेप करने की कला को संक्षेपण, विस्तृत करने की कला को विस्तारण कहते हैं, उसी प्रकार टिप्पणी लेखन की कला को टिप्पण कहते हैं।

टिप्पण लेखन की परिभाषा

किसी भी विचारधीन पत्र या आवेदन पर उसके निष्पादनको सरल बनाने के लिए जो टिप्पणियाँ सरकारी कार्यालयों में लिपकों, सहायकों तथा कार्यालय अधीक्षकों द्वारा लिखी जाती है, उन्हें टिप्पण-लेखन कहते हैं।

परिभाषा :- डॉ. महेन्द्र चतुर्वेदी के अनुसार “प्राप्त पत्रादि, डाक के बारे में, उसके अन्तिम निपटारे तक, जो लिखित या मौखिक कार्यवाही होती है, वह टिप्पण या टिप्पण-कार्य कहलाती है।“

टिप्पण लेखन की विशेषताएँ

टिप्पण की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  • टिप्पण बहुत लम्बा या विस्तृत नहीं होना चाहिए। उसे यथासम्भव संक्षिप्त और सुस्पष्ट होना चाहिए।
  • कोई भी टिप्पण मूलपत्र पर नहीं लिखा जाना चाहिए। उसके लिए कोई अन्य कागज या बफ-शीट का प्रयोग करना चाहिए।
  • टिप्पण में यदि किसी पत्र का खण्डन करना हो, तो वह बहुत ही शिष्ट और संयत भाषा में किया जाना चाहिए और किसी भी दशा में किसी प्रकार का व्यक्तिगत आरोप या आक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।
  • यदि एक ही मामले में कई बातों पर अलग-अलग आदेश लिए जाने की आवश्यकता हो तो उनमें से हर बात पर अलग-अलग टिप्पण लिखना चाहिए।
  • टिप्पण लिखने के बाद लिपिक या सहायक को नीचे बाईं ओर अपना हस्ताक्षर करना चाहिए। दाई ओर का स्थान उच्च अधिकारियों के हस्ताक्षर के लिए छोड़ देना चाहिए।
  • कार्यालय की ओर से लिखे जा रहे टिप्पण में उन सभी बातों या तथ्यों का सही सही समावेश होना चाहिए जो उस पत्रावली के निस्तारण के लिए आवश्यक हो।
  • यथासम्भव एक विषय पर कार्यालय की ओर से एक ही टिप्पण लिखा जाना चाहिए।
  • जहाँ तक सम्भव हो, टिप्पण इस ढंग से लिखा जाना चाहिए कि पत्रावली में पत्र जिस क्रम से लगे हों, टिप्पण में भी उनका वही क्रम हो।
  • टिप्पण सदा स्याही से लिखे या टंकित होने चाहिए।
  • लिपिक, सहायक और कार्यालय अधीक्षक को कागज की बाई ओर अपने नाम के प्रथमाक्षरों का ही प्रयोग करना चाहिए। उच्च अधिकारी को अपना पूरा नाम लिखना पड़ता है।

टिप्पण के प्रकार या रूप

डॉ. कैलाश चंद्र भाटिया ने ‘हिन्दी भाषा का प्रयोजनमूलक स्वरूप में टिप्पण के तीन रूप बताये हैं-

  • आवती पर टिप्पण,
  • फाइल (मिसिल) पर टिप्पण,
  • पत्राचार के रूप में टिप्पण (अंतर्विभागीय)।
  • आवती पर टिप्पण :- आवती पर नेमी कार्यालय टिप्पणियों में से जो मुनासिब हो, उसको लिख दिया जाता है-
  • देख लिया।
  • फाइल कर दिया जाए।
  • पत्र मात्र सूचना के लिए है।
  • तुरंत कार्रवाई की जाए।
  • फाइल (मिसिल) पर टिप्पण :- फाइल और टिप्पण का पारस्परिक अटूट सम्बन्ध होता है। फाइल के बायीं ओर सफेद ओर अंगूरी छटा लिये शीटों पर प्रकरण के प्रारम्भ से निपटान तक सम्बन्धित टिप्पण लिखे जाते हैं।
  • पत्राचार के रूप में टिप्पण :- यही ‘अन्तर्विभागीय टिप्पण’ है जिसमें कोई मंत्रालय किसी दूसरे मंत्रालय को एक विभाग किसी दूसरे विभाग को आवश्यक जानकारी देता है। ऐसी टिप्पणी पत्रावली पर अथवा पृथक से लिखकर भेजी जाती है। इसका अनौपचारिक टिप्पणी भी कहते हैं। इसमें मंत्रालय का नाम, विषय, प्रेषक के हस्ताक्षर (पदनाम सहित) अंकित रहते हैं। फाइल का क्रमांक दिनांक सहित भी लिखा जाता हैं जो प के रूप में प्रेषित कर दिया जाता है।

टिप्पण लेखन में सावधानियाँ

टिप्पण लिखते समय कुछ बातें ध्यान में अवश्य रखनी चाहिए,

जैसे

  • टिप्पण छोटा होना चाहिए वरना पढ़ने वाला ऊब सकता है।
  • टिप्पण में किसी प्रकार का व्यक्तिगत आक्षेप नहीं होना चाहिए। यदि किसी बात का खण्डन करना भी हो तो शिष्टाचार के साथ ही करना चाहिए।
  • टिप्पण लेखक की भाषा साफ-सुथरी होनी चाहिए ताकि उससे कोई भ्रम या संदेह न पैदा हो। सांकेतिक, आलंकारिक या द्विअर्थी वाक्य नहीं लिखना चाहिए।
  • टिप्पण में उन सभी बातों का यथातथ्य उल्लेख होना चाहिए जो पत्रावली के निस्तारण के लिए आवश्यक हों।
  • कभी-कभी एक मामले में कई तरह की जानकारियाँ माँगी जाती हैं, जिनके लिए अलग-अलग आदेश की जरूरत पड़ती है। अतः प्रत्येक बात के लिए अलग-अलग टिप्पण लिखा जाना चाहिए।
  • टिप्पण लेखक को टिप्पण पर अपना लघु हस्ताक्षर कर देना चाहिए ताकि अधिकारी को जब ज़रूरत पड़े, बुलाकर उससे विचार-विमर्श कर ले।
  • टिप्पण में अनुच्छेदों के इस्तेमाल से बचना चाहिए। लेकिन यदि जरूरी हो जाय तो क्रमानुसार संख्या देकर बात रखनी चाहिए, ताकि कोई भ्रम न रह जाय।
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